Friday, September 6, 2013

एक जीत !

यह हैरान करने वाली बात यह है कि भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था से सर्वाधिक लाभ उठाने वाले  6 मुख्य  राजनीतिक दलों (कम्युनिस्टों समेत) ने,  RTI के दायरे से बाहर रहने को एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया। इससे बचने को  कानून संशोधन पर उतारू हो गये और कांग्रेस ने अगुवाई करते हुए सहमति बनाकर कैबिनेट में  पास करवा के अध्यादेश जारी कर दिया।
          राजनीतिक दलों को RTI के दायरे
में लाने को CIC की दलील यह थी कि दूसरे प्राधिकारों की तरह पार्टियां सरकारी सम्पत्तियों/अनुदानों/प्रचार माध्यमों का फ़ायदा लेती हैं तो RTI कानून के अंतर्गत अन्य सार्वजनिक संस्थाओं की तरह उनकी कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न पूछे जा सकते  हैं। अगर पार्टियां इस तर्क से सहमत नहीं थी तो उन्हें न्यायालय जाकर अपना पक्ष रखने में क्या हर्ज़ था ? सारी व्यवस्था और लोग समझ पाते कि आख़िर वो बाहर क्यों रहना चाहते हैं ? न्यायालय जाने के बजाय वो कार्यपालिका की ताकत के दंभ में संविधान संशोधन पर उतारू हो गए जिससे इस विषय पर अधिक संवाद न हो और जब संसद की स्वीकृति के लिए प्रस्ताव पेश हो तो पहले से बनी सहमति के आधार पर उसे पारित करना मात्र औपचारिकता रह जाए। गौरतलब है कि कोई अन्य संस्था अगर ये महसूस करे कि उसपर RTI कानून 2005 लागू नहीं होता तो वो कोर्ट जाएगी या कानून में संशोधन करवायेगी ? लोकतंत्रीय प्रणाली का इससे बड़ा मखौल क्या हो सकता है कि लोगों की ज़ुबान बंद करने को कैबिनेट प्रस्ताव पास कर डाले। 
     केन्द्रीय  सूचना आयोग के राजनीतिक दलों को बेचैन कर देने वाले  इस कदम के विरुद्ध लाये गए संशोधन के पास होते ही कल 5 सितंबर 2013 को राजनीतिक दलों की जनता के प्रति जवाबदेही का प्रश्न दफ्न हो गया होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ,प्रक्रिया टल गई  और RTI एक्ट संशोधन बिल सदन की स्टैंडिंग कमेटी को भेज दिया गया। संसद में लोगों की एक छोटी सी जीत दर्ज़ हुई।  हालाँकि पॉलिटिकल क्लास के हालिया चरित्र को देखते हुए उनके इरादों को भाँपना आसान नहीं है लेकिन जिस अंदाज़ में कुछ युवा नेताओं जैसे जय पांडा, उमर अब्दुल्ला, ममता बनर्जी और आम आदमी पार्टी ने इसका विरोध किया तथा सिविल सोसाइटी की अरुणा रॉय ने संशोधन के विरोध में सोनिया गांधी को अपनी राय दी उससे उम्मीद की जा सकती है की स्टैंडिंग कमेटी में भी ऐसी आवाज़ें उठेंगी और अपना प्रभाव डालेंगी ... ... कल पार्टियां आरटीआई के दायरे में आयें या न आयें पर क्या आप समझते हैं कि पारदर्शिता के प्रश्न पर इतने हिंसक हो जाने वाले हमारे नेतागण हमें लोकपाल जैसा जनपक्षीय कानून देंगे ?

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